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सैड सांग

दहेज के दबाव से दरकने लगी भूमिहारों की परम्‍परा-थाती

: उपभोक्‍ता-सोच अब बेहद हावी होती जा रही है भूमिहार ब्राह्मण समाज में, वजह है बेटियों का विवाह : हर कीमत पर जमीन ने छोड़ने वाले भूमिहार अब जमीन बेचने पर आमादा : समस्‍या का समाधान सोशल मीडिया पर नहीं, जन-जागरण से ही मुमकिन होगा :

मेरी बिटिया संवाददाता

गाजीपुर : सामान्‍य तौर पर यही माना जाता है कि भूमिहार ब्राह्मण समुदाय को अपनी जमीन से बेहद प्रेम है। यह मोहब्‍बत उनके प्राण से ज्‍यादा मानी जाती है। इस लगाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह समुदाय अपनी परिवार तो दूर, अपनी बेटी-बेटे से ज्‍यादा स्‍नेह और लगाव अपनी जमीन से रखते हैं। माना यही जाता है कि भूमिहार समाज की मजबूती का असल आधार केवल यही तथ्‍य और तर्क है।

लेकिन अब यह हालत, निष्‍ठा, स्‍नेह, प्रेम वगैरह के मूल्‍य अब तेजी से पिघल कर बहते जा रहे हैं। हालांकि एक दौर हुआ करता था, जब ब्राह्मण परिवार के लोग अपने बेटी-बहन की शादी के आयोजन आदि की जरूरतों को पूरा करने के लिए और चाहे कुछ भी कर बैठें, लेकिन किसी भी कीमत पर अपनी जमीन नहीं बेचते थे। यह परम्‍परा गरीब से गरीब भूमिहार पर लागू होती थी, और अमीर से अमीर भूमिहार तक में। लेकिन अब यह परम्‍परा टूटती जा रही हैं। वजह है दहेज और विवाह पर बढ़ता सुरसा सरीखा खर्चा, जिसे पूरा कर पाने में अधिकांश भूमिहार ब्राह्मण असमर्थ होते दीख रहे हैं।

गाजीपुर की रहने वाली और अपने सामाजिक दायित्‍वों के लिए पूरे पूर्वांचल में सक्रिय एक सामाजिक कार्यकर्ता और नेता सीमा राय इस बारे में ज्‍यादा चिंतित हैं। उन्‍होंने इस बारे में अपनी वाल पर अभियान छेड़ रखा है। उनका कहना है कि भूमिहार_ब्राह्मणों की शादी में दहेज को लेकर ज़मीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। दहेज कम होने की बजाए बढ़ा ही है!लड़का-लड़की पक्ष में से कोई भी मानने को तैयार नहीं!शादी में दिखावे की प्रवृति और उसपर बेहिसाब खर्चा बढ़ा है!ज़मीन बेचकर बेटियां ब्याही जा रही है! इस बार एक दर्जन शादियां अटेंड करने के बाद ज़मीनी निष्कर्ष!दहेज को लेकर फेसबुक जागरूकता का ज़मीनी हकीकत से कोई वास्ता नहीं!ये एक कटु सत्य है!-भूमिहार-की-शादी-दहेज प्रथा रोकने के लिए कानुन बने! सीमा राय ने इस बारे में यह राय व्‍यक्‍त की, तो उनकी वाल पर निम्‍नांकित कमेंट आने लगे:-

Praveen Rai दहेज लेना और देना दोनों पाप है। इस पाप को समाप्त करने के लिए सहयोग करे। क्योंकि सबके पास बहन और बेटी हैं।

Chandraprakash Rai पूरबी up औऱ बिहार में तो दहेज को लेकर बहुत ही बुरा हाल है इस पर सरकार को सख्त से सख्त कानून व्यवस्था करना चाहिए आम लोगों को तो लड़कियों की शादी करना बहुत मुश्किल हो गया है।।

Rai Gudu यह काम सरकार का नहीं जागरूकता लाने की है और अपने समाज को इकट्ठा करने की

Sunil Tyagi अच्छा सन्देश , दहेज पर कानून पहले से ही है। पर जब तक समाज नही जगरूक होगा तब तक कुछ नही होगा । समाज के युवाओ को ही आगे आना चाहिये।

Awnish Raiguddu आप सनदेश बहुत बडीया है कानून हम और आप हैलोग कहते है करते नही फेसबुक पर केवल मेसेज डालते है माँ और बाप सेवा करना चाहिए केवल फेसबुक पर सेवा है लोग कहते है आफ का बेटी मेरी बेटी दहेज कयो कराइम कयो सभी को अपना सुधार सँसार कि सेवा है अपना सुधार कर ले मे गुडूडू राय भूमिहार गोररखपु यू.पी.।सिगापुर।जय श्री राम

Ram Rai लड़के वाले मुंह खोलकर मांगते हैं उनको शरम भी नहीं आती और बढा़ चढा़ कर लोगों से कहतें हैं कोई भी भूमिहार जो बिना दहेज की शादी किया हो तो बतानें का कष्ट करें केवल फेस बुक पर अच्छा मैसेज लिख देने से कुछ नहीं होने वाला जो भूमिहार में जाने माने धुरंधर हैं उनको आगे आना चाहिए और बिना दहेज की शादी करनी चाहिए और अपने कमजोर भाईयों का साथ देना चाहिए लेकिन ऐसा करने वाला कोई नहीं है कमजोर अपने को कमजोर नहीं समझता वह पैसे वाले का मुकाबला करने में पैसा और जमीन दोनों से चला जाता है ।

Pratibha Rai हृदयविदारक सत्य भाभीजी ।आँसू रोके नहीं रुक रहा था ।देश की बेटियों को दया नहीं सामर्थ्य और अधिकार चाहिए और वे इसे लेकर रहेंगी ,ऐसा मेरा दृढ विश्वास है।

Sanjaykumar Rai संदेश बेहद ही भावुकतापूर्ण और यथार्थ है।जात के नाम पर संगठन बनाकर पद और पैसा का ध्यान तो देते और दहेज कुप्रथा के खिलाफ ओजस्वी भाषण बहुत बहुत सुने परन्तु दहेज बिरुद्ध आचरण से संदेश देने वाला या वाली कोई नहीं दिखा अथवा दिखी।

K P Narayan दहेज के लिए कानून बनाने से नही कुछ होगा, मनुष्य की प्रवृत्ति और सोच बदलना होगा. तभी कुछ संभव होगा.

महिला दिवस: संस्‍कार भारत का, प्रदर्शन स्‍वाजीलैंड का

: स्‍वाजीलैंड की महिलाएं कमर से ऊपर नंगी होती हैं, जबकि ग्रामीण भारतीय स्‍त्री हाथ भर घूंघट काढ़ती है : क्‍या स्‍त्री की पहचान उसके अर्द्धनग्‍न और केवल अन्‍नमय कोश तक ही सीमित है : सवाल कि केवल सौंदर्य तक ही सीमित रहना चाहिए महिला दिवस :

कुमार सौवीर

लखनऊ : आज महिला दिवस है। यह दिवस क्‍यों बना या कब से बनाया जाना शुरू हुआ, आज इस बहस में बेमानी है। वजह है इस मौके पर एक नयी बहस शुरू हो गयी है। सवाल यह उठा है कि महिला-दिवस क्‍या केवल महिला के सौंदर्य उपासना तक ही सीमित आयोजित किया जाए। किसी भी महिला का वंदन केवल इसलिए किया जाए कि वह खूबसूरत है, एक देह तक सीमित है।

उपनिषद में ऋषियों ने मानव की चेतना को पाँच भागों में बांटा है। इसी विभाजन को पंच-कोश कहा जाता है। अन्नमय कोश का अर्थ है इन्द्रिय चेतना। प्राणमय कोश, अर्थात् जीवनी शक्ति। मनोमय कोश, यानी विचार बुद्धि। विज्ञानमय कोश, यानी अचेतन सत्ता एवं भाव प्रवाह। तथा आनन्दमय कोश का अर्थ होता है आत्म-बोध यानीआत्म-जागृति। किसी भी प्राणी का स्तर ऐसी चेतनात्मक परतों के हिसाब से ही विकसित होता जाता है। तो पहले नम्‍बर पर तो है अन्‍नमय कोश के प्राणी। मसलन कीड़े-मकौड़ों-पतंगे जैसे तो जलचर-थलचर-नभचर वगैरह, जिनकी चेतना केवल उसकी इन्द्रियों की प्रेरणा और आवश्‍यकताओं के इर्द गिर्द ही घूमती रहती है। शरीर ही उनका सर्वस्व होता है। उनका ‘स्व’ काया की परिधि में ही सीमित रहता है। इससे आगे की न उनकी इच्छा होती है, न विचार, और न ही तत्‍सम्‍बन्‍धी वैचारिक-क्रिया। इस वर्ग के प्राणियों को अन्नमय कह सकते हैं। आहार ही उनका जीवन है। पेट तथा अन्य इन्द्रियों का समाधान हो जाने पर वे संतुष्ट रहते हैं।

जबकि चैतन्‍य भाव सर्वश्रेष्‍ठ है।

मगर स्‍वनामधन्‍य कांग्रेसी, कलाकार, लेखक चंचल-भूजी ने महिला दिवस की पूर्व संध्‍या में स्‍त्री को उसके सौंदर्य तक सीमित कर देने की कोशिश की है। कहने की जरूरत नहीं कि उनका यह प्रक्रम किसी भी सौंदर्यशाली स्‍त्री को केवल अन्‍नमय कोश तक ही सम्‍पूर्ण समेटने की कोशिश है। इसीलिए भूजी-जी को जब महिला दिवस की याद आयी तो वे सीधे अफ्रीका के दक्षिणी देश लेसेथो के पड़ोसी स्‍वाजीलैंड मुल्‍क पहुंच गये, जहां का राजा अपनी 32वीं शादी अपनी पोती की उम्र से भी कम वाली युवती से करना चाहता है, और पूरी ब्रिटिश सरकार उस राजा की वकालत में जुटी है। और वह लड़की उस राजा से अपना पिंड छुडा़ने के लिए जहां-तहां अपना सिर पटक रही है। सही बात है, ऐसा टनाटन्‍न खुला सौंदर्य उनको जौनपुर में कहां दिख पाता। सिंगरामऊ में तो एक हाथ का घूंघट तान लेती हैं वहां की महिलाएं भूजी-जी को देखते ही। यह इसलिए ज्‍यादा बहस मांगता है कि अपनी पोस्‍ट में भूजी ने जिस फोटो को लगाया है, वह स्‍वाजीलैंड की महिलाओं की है, जो कमर से ऊपर वस्‍त्रहीन होती हैं, परम्‍परा और जीवनशैली के तहत।

बहरहाल, आइये बांचिये कि भूजी-जी ने क्‍या लिखा है इस मसले पर। फोटो के साथ। कल महिला दिवस है . हम इसे एक दिन पहले ही निपटा ले रहे हैं . गो कि हमारे जैसे जैसों के लिए हर रोज महिला दिवस रहता है . सरे राह चलते चलते पूज लेते हैं , प्यार कर लेते हैं . करुणा का प्रसाद पाकर धन्य हो लेते हैं . वह किसी भी रूप में हो है तो वन्दनीय ही . हम पुरुष उससे इस लिए भी चिढते हैं कि सौंदर्य एकतरफा उधर ही क्यों दे दिया गया , हमें भी तो कुछ मिलना चाहिए था . प्रकृति हँसती है - कमबख्त तुम्हे जो मिला उसी को नहीं सम्हाल पा रहे हो ,सौंदर्य को कहाँ से पचा पाते . बाज दफे तो पुरुष को भी सौंदर्य का सहारा लेने के लिए औरत होना पड़ा है .

दूर क्यों जा रहे हो विष्णु जी को देखो . भस्मासुर से बचने के लिए जब शिव भागे हैं विष्णु जी मोहनी का रूप लेकर आये हैं . मानव मन की कुटिलता देखो भस्मासुर शिव को छोड़कर 'काम ' के सामने झुक जाता है . जिस काम को शिव ने भस्म किया है . उसे अनंग बनाया है . वही काम आज शिव को जीवन दे रहा है . भस्मासुर मोहनी पर मोहित होता है और वहीं भस्म हो जाता है . इस लिए हे मित्र ! मिथक कथाओं को रातो मत , कोशिश करो उसे जीने की . उसके मर्म को जान लो . जीवन सुफल हो जायगा . हमारे नेता डॉ लोहिया ने कहा है -हर औरत खूबसूरत होती है कोइ कुछ कम कोइ कुछ ज्यादा . ' इन्हें बाँधो मत , इन्हें उन्मुक्त जीवन जीने का माहौल दो . बहुत पाप किया है इस समाज ने . प्रायश्चित तो करो . रिस्तो का निर्वहन करो . एक बार फिर डॉ लोहिया की युक्ति -वायदाखिलाफी और बलात्कार छोड़ कर ,औरत और मर्द के सारे रिश्ते जायज हैं . जीना है तो इस रिश्ते पर जियो .

सौंदर्य हर औरत के पास होता है यह उसका स्थाई भाव है . और यह सौंदर्य देश ,काल और परिस्थिति से तय होता है .

हमने आज ही महिला दिवस मना लिया भाई ,ताकी यह कल काम आये . क्यों कि आज कल पत्थरबाजी जोरो से हो रही है .मौसम में हिंसा है . हम अपने हिस्से के मोहब्बत की छाँव में बैठे गुनगुना रहे हैं .

सीतापुर में हिन्‍दुस्‍तान ने सजा डाली पत्रकारिता की झक्‍कास अर्थी

: इसी हिन्‍दुस्‍तान अखबार के प्रभारी ने एक व्‍यवसायी से मांगा था 50 हजार रूपया : पांच दिन तक चलने वाली हाथी-घोड़ा परिक्रमा की फोटो को बरामद माल साबित कर दिया : साइबर कैफे की चोरी से बरामद माल को अभिनन्‍दन-समारोह से जोड़ कर गजब प्रयोग कर डाला है हिन्‍दुस्‍तान ने :

मेरी बिटिया संवाददाता

सीतापुर : हिन्‍दुस्‍तान अखबार को तो आप जानते ही होंगे। नहीं जानते, कोई बात नहीं। हम आपको इस अखबार का परिचय दिये देते हैं। यह वही अखबार है, जिसके जिला प्रभारी राकेश यादव ने सीतापुर के एक बड़े व्‍यवसायी से पचास हजार रूपयों की रंगदारी मांग ली थी। कहने को तो यह रकम हिन्‍दुस्‍तान अखबार के एक समारोह के लिए मांगी गयी थी, लेकिन यह रकम मांगने की शैली निहायत अभद्र और आपराधिक थी। बाकायदा फोन पर मांगी गयी थी यह रकम, जैसे जेल में बंद कोई कुख्‍यात अपराधी अपना हफ्ता मांगता हो।

बहरहाल, अब एक नया ताजा जोश और एक नयी रवानगी के साथ यह अखबार और उसके जिला प्रभारी एक नया प्रयोग करने में जुटे हैं। समझा जाता है कि इस अभियान का मकसद इस खबर में उस खबर की फोटो में घुसेड़ डालना। और उसके बाद पाठकों को चकित कर देना कि:- बेटा, अब खोजो कि कहां है खबर, और कहां है फोटो। कहने की जरूरत नहीं कि हिन्‍दुस्‍तान अखबार के इस अभिनव प्रयोग की धूम पूरे जिले में इस वक्‍त झूम रही है।

इन दो खबरों की ओर नजर डालिये, तो आपको ऐसे अभियान की असलियत का अहसास हो जाएगा। इसमें एक मालबाबू को रिश्‍वत लेते हुए पकड़े गये मामले की खबर है। लेकिन इसमें जो फोटो लगायी गयी है वह गजब है। बताया गया कि मालबाबू से बरामद माल की तस्‍वीर। लेकिन इसमें जो फोटो है, वह पांच दिन तक मिश्रिख में चलने वाली परिक्रमा की है, जिसमें एक संन्‍यासी-साधु घोड़े पर परिक्रमा कर रहा है। उधर एक साइबर कैफे में हुई चोरी का एक मामला जब खुला तो उसमें माल भी बरामद हुआ। इस अखबार ने उसकी भी बड़ी खबर छापी है। लेकिन फोटो में बरामद माल की नहीं, बल्कि किसी उद्घाटन कार्यक्रम की लगायी गयी है।


अबे कूद बे कूद, बाथटब में कूद

: सरकार की सूचना जनता को देने पत्रकार अब लोकतंत्र पर हावी : मीडिया आपकी उम्मीद और उसकी उम्मीद विज्ञापन : घर, ऑफिस, मंहगे मॉल-रेस्टोरेंट जाने वाला और पाँच गर्लफ्रेड बनाने की ख्वाहिश रखने वाला वर्ग चेतना-फेतना नहीं समझता :

हरिशंकर शाही

लखनऊ : भारतीय मीडिया के श्रीदेवी की मौत विलाप करते-करते बाथटब कूदवा हो जाने को लेकर सोशल मीडिया और समाज में लोग व्यथित से दिखते हैं. लेकिन आप लोग व्यथित क्यों हैं भाई, जब केजरी गैंग के लिए तख्ती टांग के निकले थे तब नहीं सोचा था, कि एक दिन गैंग केजरी पीएनबी घोटाले पर चुप्पी लगाएगा. या जब प्रिंस गड्ढे में था तब नहीं सोचा था कि एक दिन बिहार में नौ बच्चों को कुचल देने वाले नेता पर सब चुप हो जाएँगे. भारतीय मीडिया वाइस ऑफ वाइसलेस यानी बेजुबानों की आवाज से कब एक कैटलिस्ट यानी उत्प्रेरक की भूमिका में आ चुका है यह आप जान ही नहीं पाए हैं, और दोष दे रहे हैं मीडिया को.

बात शुरू करते हैं टीवी पर पत्रकारिता देखने वालों से, आखिर भारतीय पत्रकारिता के बाथटब कूदवा संस्करण से सबसे अधिक आहत भी तो यही हैं. तो बात करते हैं भारतीय पत्रकारिता और मीडिया के बने दो ध्रुवों की, चलिए सुविधा के लिए एक ओर रवीश कुमार को रख लीजिए और दूसरी ओर सुधीर चौधरी को, अब दोनों की पत्रकारिता को छोड़ दीजिए फिलहाल दोनों के शो पर आने वाले विज्ञापनों को देखिए और दोनों के प्रयोजकों को भी. आपको एक अजब सी समानता मिलेगी मतलब दोनों के विज्ञापन देने वाली कंपनियाँ करीब एक ही हैं. और यहाँ तक कि आपको रवीश कुमार के कार्यक्रम के मुख्य प्रायोजक बाबा रामदेव की पतंजलि आयुर्वेदिक है, जबकि आम धारणा यह है कि रवीश कुमार हिंदुत्व, भगवा खेमे और बीजेपी के खिलाफ हैं, वहीं बाबा रामदेव के विज्ञापन रवीश कुमार के कार्यक्रम पर, यानी रवीश कुमार को उसी धड़े से आ रहे पैसे से एतराज नहीं है, ये जो ऐतराज़ नहीं है या अधिक किराँति की भाषा में कहूँ तो यह जो व्यापार है ना वही तय करता है सबकुछ.

चलिए मीडिया से पहले बात करते हैं मनोरंजन के उद्योग का जिसकी शुरूआत भारत में दूरदर्शन से होती है. इसके धारावाहिकों को आप देखिए शुरूआत होती है हमलोग, नुक्कड़ जैसे धारावाहिकों में जिसमें का आदमी बिल्कुल आम होता था. और आज बात करते हैं मल्टी चैनल की जहाँ तारक मेहता का उल्टा चश्मा है जिसमें के सारे कैरेक्टर हमेशा सुख-चैन से जीते हैं और जिनकी समस्याएँ गंदगी और भ्रष्टाचार होते हैं, भूख-प्यास तो यहाँ है ही नहीं. बाकी आपको टीवी वाले गरीब परिवार भी लकदक सफ़ाई वाले मिलेंगे जो आपको कहीं दिखेगा नहीं. खैर तो यह डेकोरेशन कैसे आया यह समझेंगे तो मीडिया समझ आ ही जाएगा. टीवी मीडिया में मारवाड़ी और गुजराती जैनी परंपराएँ दिख रही हैं तो समाचार मीडिया में भी उनके स्वादानुसार खबरें परोसी जाएँगी.

वैसे विश्व मीडिया और कार्पोरेट पत्रकारिता के दो पुरोधा हर्स्ट और पुलित्जर के बीच जंग ही एक येलो साबुन के विज्ञापन के मिलने और ना मिलने से शुरू हुई थी और यहीं से पीत पत्रकारिता यानी येलो जर्नालिस्म का शब्द आता है. तो यह विज्ञापन देता है कौन, जाहिर है विज्ञापन बाजार देता है. तो बाजार विज्ञापन देता है मतलब वह विज्ञापन से अपने लिए फायदा चाहेगा ही और अगर फायदा ही नहीं है तो विज्ञापन क्योंकर देगा. जो पुलित्जर और हर्स्ट एक साबुन के विज्ञापन के लिए भिड़ गए थे, उनके ही नामपर पत्रकारिता के अवार्ड होते हैं. अब इससे बड़ा मज़ाक क्याा होगा.

वैसे यहाँ एक मिनट रूकते हैं, आपको अखबार या पत्रकार या मीडिया से इतनी उम्मीद क्यों है कि वो आपके हिस्से की जंग लड़ेगी. अखबार का जन्म चाहें जर्मनी में हुआ हो जिसे पहला अखबार माना जाता है या फिर भारत के बंगाल का पहला अखबार, सब अपने मूल रूप में सरकार की सूचना जनता को देने के लिए निकाले गए थे. यानी मूल रूप से अख़बार जनता को सूचना देता था. अब यह सूचना देने वाला तंत्र कब लोकतंत्र पर हावी हो गया है यह तो आपको अख़बार की व्यवस्था में नहीं बल्कि उसके छापने वालों पर मिलेगा. मतलब अख़बार केवल आपको सूचना देने के लिए राजशाही या उपनिवेश वालों द्वारा शुरू किया गया था किसी क्रांति के लिए नहीं जैसा आपको भ्रम है. अखबार या समाचार मीडिया का मूल काम सूचना देना है.

बीच में जैसे होता है तमाम आंदोलन आए और कई ऐतिहासिक घटनाएँ हुईं साथ ही कई बातें होती गईं, जैसे विश्व युद्ध, हिरोशिमा-नागासाकी, वियतनाम, कैनेडी की हत्या इन सबने सूचनाओं के इस माध्यम को सत्ताओं के खिलाफ सूचना देने या थोड़ा सा जनता के प्रति जवाबदेह बना दिया. लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसकी आजादी के साथ ही इसमें लगने वाले खर्चों के लिए पैसे वालों का प्रवेश होने लगा. अब पत्रकारिता कर रहे लोगों को भी पैसे चाहिए ना आखिर मुँह-पेट आँख नाक तो उनके भी हैं जब राजनीति के स्वंयसेवक लाखों की गाड़ी से टहल सकते हैं तो फिर पत्रकार का भी हक है खाने भर को पैसे मिलें.

खैर तो विज्ञापन से आय कमाने का साधन पत्रकारिता को मिलते ही यह बाजार के नियंत्रण में आ चुकी थी. कुछ लोग पुराने समय को याद करते हैं कि पहले संपादक यह थे वो थे, पर अभी तक जितने भी रिटायर लोगों को देखा सुना है अधिकतर किसी ना किसी पार्टी के फुल टाइमर ही रहे हैं. मसलन अगर धीरूभाई अंबानी के खिलाफ इंडियन एक्सप्रेस के कैंपेन किसी को याद हैं तो फिर वह कैंपेन चलाने वाले पत्रकार अरूण शौरी को भी याद रखना चाहिए.

तो कुल मिलाकर बात यह है कि मीडिया को अपने चलने के लिए विज्ञापन चाहिए क्योंकि आपको सैकड़ों की लागत वाला अखबार तीन रूपए में चाहिए. अब इस कमी को पूरा करने के लिए विज्ञापन पर निर्भरता बढ़ेगी और बढ़ेगी तो विज्ञापन उसी को मिलेगा जिसे बाजार के संभावित या बड़े ग्राहक देखेंगे यानी वही अपर मिडिल-क्लास से लेते हुए उच्च वर्ग तक को ही प्रभावित करने की कोशिश बाजार करना चाहेगा क्योंकि बाकी का मिडिल-मिडिल क्लास या फिर लोअर मिडिल क्लास तो ऊपर वाले वर्गों के तय किए हुए ट्रेंड पर खरीदता है. तो फिर जो वह बड़ा दर्शक चाहेगा वही मीडिया को दिखाना पड़ेगा. घर से ऑफिस और ऑफिस से घर अधिक से अधिक मंहगे मॉल या रेस्टोरेंट में जाने वाला और पाँच गर्लफ्रेड बनाने की ख्वाहिश रखने वाला वर्ग चेतना-फेतना नहीं समझता है. तो जब आप उपभोग वादी हैं तो फिर क्यों उम्मीद करते हैं कि मीडिया आपके बारे में लिखेगा बोलेगा... फिर तो वह बाथटब में ही कूदेगा ना... तो कूद गया....

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